कल उस की आँख ने क्या ज़िंदा गुफ़्तुगू की थी
गुमान तक न हुआ वो बिछड़ने वाला है
– उम्मीद फ़ाज़ली
सतीश शाह अब हमारे बीच नहीं रहे। यह ख़बर सुनते ही भारतीय सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा जैसे ख़ामोश हो गया। उनके जाने से सिर्फ़ एक कलाकार नहीं गया, बल्कि वो शख़्सियत रुख़सत हुई जिसने हँसी के ज़रिए सबसे गहरी सच्चाइयों को दिखाने का हुनर रखा।

“जाने भी दो यारो” का डी’मेलो उनकी अदाकारी का ऐसा आइकॉनिक किरदार था जिसने मरकर भी ज़िंदगी के कई मायने याद दिला दिए।
“देश की उन्नति की पहचान, अगर किसी चीज़ से होती है… तो वो है गटर।”
1983 का वो दौर, जब देश सत्ता और भ्रष्टाचार के बोझ तले दबा जा रहा था, तब कुंदन शाह की यह फ़िल्म आई थी — जैसे सिनेमा ने समाज के ज़ख़्मों पर हँसते-हँसते नमक रखा हो।
डी’मेलो उस दौर की नौकरशाही का आइना था — भ्रष्टाचार, दिखावे और ताक़त का प्रतीक।
सतीश शाह ने इस किरदार को ऐसे निभाया कि हक़ीक़त और मज़ाक़ के बीच की रेखा मिट गई।
उनकी मुस्कान में चालाकी थी और उनकी ख़ामोशी में सच्चाई।
“थोड़ा खाओ, थोड़ा फेंको… बहुत मज़ा आएगा।”
डी’मेलो फ़िल्म में जब तक ज़िंदा है, सत्ता का चहरापन दिखाता है; और जब मरा हुआ दिखाया गया, तब वो समाज के मृत ज़मीर का प्रतीक बन जाता है।
उसकी लाश फ़िल्म के आधे हिस्से तक स्क्रीन पर रहती है — कभी रोलर स्केट पर लुढ़कती, कभी लिफ्ट में फँसी, कभी मंच पर महाभारत में घुसकर सब कुछ उलट देती।
वह मरा हुआ जिस्म, ज़िंदा समाज का सबसे सटीक आईना है।
फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह और रवि वासवानी जैसे आम इंसान डी’मेलो की उस लाश को इधर-उधर ले जाते हैं। ये दृश्य देखने में हास्यपूर्ण हैं, पर भीतर से यह एक गहरी त्रासदी है — क्योंकि वे उस सिस्टम का बोझ उठा रहे होते हैं जिसने उन्हें ही दबा रखा है।
डी’मेलो का शव दरअसल उस मुल्क का रूपक है, जहां ईमानदारी को भी कब्र में सुला दिया गया है।
“द्रौपदी तेरे अकेले की नहीं है, हम सब शेयरहोल्डर हैं…”
“महाभारत” का यह प्रसिद्ध दृश्य फ़िल्म की आत्मा है। जब मंच पर द्रौपदी का चीरहरण हो रहा होता है और अचानक एक भ्रष्ट अफ़सर की लाश उस पवित्र नाटक में घुस आती है — तो पूरा समाज एक तंज़ बन जाता है।
दर्शक हँसते हैं, मगर उनकी हँसी के भीतर तक दर्द उतर जाता है।
यह सीन सिर्फ़ एक मज़ाक नहीं, बल्कि हिन्दुस्तानी तहज़ीब की गिरती हुई नैतिकता पर सबसे तीखा व्यंग्य है।
सतीश शाह ने कमाल ये किया कि उन्होंने “लाश” को भी अभिनय दिया।

उनका बदन अकड़ा हुआ सही, मगर हावभावों में जान थी।
चेहरे की एक अजीब मुस्कान, आँखों की जमी हुई चमक — सब कुछ बोलता था।
यह अदाकार सिर्फ़ कॉमेडी का उस्ताद नहीं था; वह संवेदना का शायर था, जो हर हरकत से समाज की कहानी बयान करता था।
डी’मेलो का किरदार भले मर चुका था, मगर उसका असर ज़िंदा रहा।
उसने हमें आईना दिखाया कि जब व्यवस्था ही सड़ जाए, तो ईमानदारी एक बोझ और सच एक परेशानी बन जाता है।
उस समय का भारत — और शायद आज का भी — इसी सच्चाई से जूझ रहा है।
सतीश शाह की अदाकारी ने इस दर्द को हँसी की परतों में लपेटकर दिखाया, ताकि हम उसे महसूस कर सकें बिना टूटे।
आज जब हम उनकी यादों को जोड़ते हैं, तो एहसास होता है कि “जाने भी दो यारो” जैसी फ़िल्में और डी’मेलो जैसे किरदार कभी बूढ़े नहीं होते।
वे जीवित हैं — हर बार जब कोई सिस्टम की सड़ांध पर हँसने की कोशिश करता है।
सतीश शाह ने हमें यह सिखाया कि कॉमेडी सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की आलोचना का सबसे ताक़तवर ज़रिया है।
उनकी अदाकारी में एक अजीब सादगी थी — जो बड़े-बड़े व्यंग्य को भी मानवीय बना देती थी।
उन्होंने दिखाया कि अभिनय सिर्फ़ बोलने में नहीं, बल्कि ख़ामोश रहने में भी होता है।
डी’मेलो की वही ख़ामोशी आज भी गूंजती है — जैसे हमारे भीतर कोई सवाल छोड़ गई हो: क्या हममें ज़रा-सी भी ज़िंदगी बाकी है?

अलविदा सतीश शाह।
आप हँसी के राजा थे, मगर आपकी हँसी में हमारी हकीकत छिपी थी।
अब जब पर्दा गिर चुका है, तो सिर्फ़ एक ख़ालीपन बचा है — मगर आपका डी’मेलो हमारे ज़मीर में हमेशा ज़िंदा रहेगा।
शायद इस मुल्क को अब भी उस “लाश” की ज़रूरत है जो हमें हमारी सच्चाई दिखाती रहे।
घसीटते हुए ख़ुद को फिरोगे ‘ज़ेब’ कहाँ
चलो कि ख़ाक को दे आएँ ये बदन उस का— ज़ेब ग़ौरी
श्रद्धांजलि : दिनेश धवने
नागपुर फ़िल्म सोसाइटी
About the Author: Dinesh Dhawane
Dinesh Dhawane is a publisher, author, bibliophile, paleo-botanist, and passionate film critic. He has authored numerous professional books for universities and colleges, contributing significantly to academic literature. A dedicated collector of rare books, he owns one of the largest personal libraries in the country.
An avid cinema enthusiast, Dinesh is widely regarded as an authority on film history and personalities. He serves as a Core Committee Member of both the Nagpur Book Club and the Nagpur Film Society, actively promoting literary and cinematic culture.
बहोत खूब… यादें ताजा हो गई
True, Satish shah was great actor .
All wonderful memories freshen up after reading the article on Satish shah
Tumcha haa lekh khub chan aahe……….
Satish saha che jevan charitra thodkyat sundar prakarane sangitale aahe……
Khup chan 👍